Monday, May 30, 2016

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Watch This Spicy Images, Her Beauty Will Shake Your Mind


Sony Charishta is an young and talented actress from telugu film industry. After proving her worth in tollywood she is all set to storm the tamil film industry with her forth coming tamil movie.

















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Do you Know Untold Story Of This 4g Girl ?


एयरटेल 4जी एड से सबकी चहेती बन चुकी 4जी गर्ल नाम से मशहूर साशा छेत्री के बारे में ऐसी कई बातें हैं जो हर कोई नहीं जानता होगा. साशा के बोलने के अंदाज के अलावा उनकी लुक्स और हेयरकट की भी बहुत तारीफ हुई.



साशा उत्तराखड़ देहरादून की रहने वाली हैं. शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रही साशा ने 10वीं तक की पढ़ाई दून के ब्राइटलैंड स्कूल, 12वीं वेल्हम गर्ल्स से पास की है. इसके बाद वो पूना चली गई, जहां से उन्होंने सिंबोसिस से इंग्लिश लिट्रेचर की पढ़ाई पूरी की है. अपने पहले ही विज्ञापन से छा जाने वाली साशा ग्लैमर की दुनिया में नया नाम नहीं है बल्कि इससे पहले भी वो माडलिंग करती रही हैं.
साशा ने विज्ञापन जगत में कॅरियर बनाने के लिए खासी मेहनत की है. उन्होंने मुंबई में जेवियर्स इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन्स से विज्ञापन की पढ़ाई की है. बहुत कम लोगों को पता है कि साशा इमरान खान और कंगना रनौत अभिनीत फिल्म ‘कट्टी-बट्टी’ में बतौर गेस्ट अपीयरेंस नजर आ चुकी है. कट्टी-बट्टी का ये गाना काफी पॉपुलर भी हुआ था. ‘सौ आंसू रुलाए ये अंखियां’ में साशा को बेहद पसंद किया गया था.
साशा को बचपन से उनके पिता ने ही पाला है. महज 12 साल की उम्र में साशा ने अपनी मां को खो दिया था. तब से उनके पिता ने ही माता-पिता दोनों की जिम्मेदारी निभाई.


जल्द लांच करेगी एलबम
म्यूजिक में रूचि रखने वाली साशा के फैंस के लिए एक खुशखबरी है. वो बहुत जल्द अपना खुद का म्यूजिक एलबम लांच कर सकती हैं.


लेखन में भी कर चुकी है काम
साशा की म्यूजिक के साथ लेखन में भी अच्छी पकड़ है. वो बतौर कॉपीराइटर भी काम कर चुकी हैं.
54,406 बार दिखाया गया साशा का ये दिलचस्प एड
54,406 बार दिखाया गया एड ब्रॉडकास्ट ऑडियन्स रिसर्च काउंसिल ऑफ इंडिया (बीएआरसी) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार 19 सितंबर से 20 नवंबर 2015 तक साशा का एयरटेल 4जी वाला एड 54,406 बार दिखाया गया….

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Saturday, May 28, 2016

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22 वर्षीय बहादुर लड़की अपनी पढ़ाई छोड़ ISIS आतंकियों से सीधा मुकाबला कर रही है


पॉलिटिक्‍स की एक छात्रा दुनिया में बर्बरता का पर्याय बन चुके आतंकी संगठन इस्‍लामिक स्‍टेट के आतंकियों से सीधे लोहा लेने सीरिया गई। उसका कहना है कि आतंकियों का खात्‍मा करना बहुत आसान है।
डेनमार्क की इस लड़की ने यह भी बताया कि वहां बच्‍चे-बच्‍िचयों का यौन उत्‍पीड़न हो रहा है। जोन्‍ना पालानी नाम की इस 22 वर्षीय बहादुर लड़की ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी है। अब वह हत्‍यारे आतंकियों से सीधा मुकाबला कर रही है।

 बंदूक चलाने में माहिर जोन्‍ना पिछले एक साल से आईएस के आतंकियों से संघर्ष कर रही है। इसके अलावा वह अन्‍य लड़कियों को भी लड़ना सिखा रही है। फिलहाल वह अपने घर वापस लौट आई है, जहां उसने युद्ध के बर्बर और भयावाह घटनाओं के अपने अनुभव को साझा किया।



उसने आईएस और सीरिया के राष्‍ट्रपति असद की सेना के अंतर को भी बताया। उसने हंसते हुए कहा कि आईएस के आतंकियों को मारना बहुत आसान है। वह अपनी जान देने में आगे रहते हैं। मगर, असद के सैनिक अच्‍छी तरह प्रशिक्षित हैं और वे दुश्‍मनों को खत्‍म करने में महारथी हैं।

वह नवंबर 2014 में कॉलेज को छोड़कर सीरियाई लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने गई थी। सीरिया जाने से पहले वह इराक गई और इसके बाद वह छह महीने के लिए पीपल्‍स प्रोटेक्‍शन यूनिट से जुड़ गई।


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Women Who Dare: Slacklining 800+ meters above sea level in heels


She’s the female world record holder, the woman who survived a car accident to rediscover herself, her physical and mental limits and, in the process, break records.
Faith Dickey, a 26 year old down to earth Texan, might be badass but not without fears. The beautiful inside-out she-daredevil who slacklines 800+ meters above sea level with effortless grace, whether barefoot or with high heels, admits that heights do indeed get to her sometimes , ”The height definitely scares me sometimes.” Says the professional slackliner ”If I’m exposed to height often I can get used to it but after a month break I am scared all over again. It’s very disorienting to be so high up on a thin line”.
Extreme sports is a field that’s dominated by men more often than not, but here’s an interview with the girl who took the slacklining world by storm and made nothing stop her.









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Thursday, May 26, 2016

Published 12:08 PM by with 0 comment

ये लड़की है इतनी खुबसूरत कि इसका घर से निकलना तक है बंद

कोई लड़की ब्‍वॉयफ्रेंड से मिलने जाती है और साथ में उसकी मां भी हो। यह थोड़ा अजीब तो लगता है लेकिन ऐसा ही कुछ हाल एंजेलिका केनोवा का है। यह लड़की इतनी खूबसूरत है कि इसे ह्यूमन बार्बी डॉल कहा जाता है। और इसकी खूबसूरती के चलते मां-बाप बाहर नहीं जाने देते।


पेरेंट्स डिसाइड करते हैं कपड़ें
दुनियाभर में कई ऐसी लड़कियां हैं, जो रियल लाइफ में बार्बी डॉल की तरह दिखना चाहती हैं। इसके लिए ये लड़कियां सर्जरी भी कराती हैं। लेकिन रूस की राजधानी मॉस्को में रहने वाली एंजेलिका केनोवा के लिए खूबसूरत होना वाकई परेशानी का सबब बन गया है। एंजेलिका का शरीर बिल्‍कुल बार्बी डॉल की तरह है। लेकिन वह खुद बार्बी की तरह नहीं दिखना चाहती, बल्कि उसके पेरेंट्स उसे गुड़िया की तरह पाल रहे हैं। इतना ही नहीं, 26 साल की उम्र में भी उसे कौन से कपड़े पहनने हैं, यह पेरेंट्स तय करते हैं। और उसे ब्वॉयफ्रेंड बनाने की भी छूट नहीं है। इसके साथ ही घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगी हुई है।


वजन है सिर्फ 38 किलो
एंजेलिका देखने में किसी गुडिया से कम नहीं है उसका वजन भी सिर्फ 38 किलो है।  इस लड़की का दावा है कि उसने कभी कॉस्मेटिक सर्जरी नहीं कराई। लड़की के फिगर को मेंटेन रखने के लिए उसके घर पर ही एक पर्सनल ट्रेनर रखा गया है। दिलचस्प यह भी है कि इस लड़की के मम्मी-पापा बचपन से ही इसे गुड़िया की तरह पाल रहे हैं। यह लड़की पेशे से मॉडल है, फिर भी अपने पेरेंट्स के नियंत्रण में रहती है। किसी लड़के के साथ डेट पर जाने के लिए उसके सामने शर्त रखी गई है कि उसकी मां भी उसके साथ जाएगी।




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Wednesday, May 25, 2016

Published 4:40 PM by with 1 comment

Improve eyesight – and throw away your glasses


Are you tired of wearing glasses and disappointed that your prescription continues to get stronger every year?  It doesn’t have to be that way.  I was wearing progressively stronger lenses for my nearsightedness until ten years ago I accidentally stumbled upon a method that allowed me to acheive 20/20 vision and throw away my glasses within a year.  For the past decade I have not worn glasses or contacts, but I am able to drive, read, and see everything clearly and sharply.
The secret was learning how to actually change my eyes so that they could focus clearly on any objects — near or far, without wearing glasses.  The method I used is one of the best examples of the self-strengthening technique called Hormetism, the focus of my blog, which I’ve applied to improve my strength and resilience in many other areas.  This is not an infomercial: The method requires several weeks or months of diligent effort, with periodic followup, and results may vary. But for this relatively small investment of time and effort, you may consider the possibility of lasting freedom from prescription lenses to be worth investigating.  It worked for me and numerous others who have tried this approach. The problem with glasses and contacts are that they are crutches. Just like using leg crutches to help you walk when you are recovering from a broken or injured leg, glasses give you the instant gratification of being able to suddenly see clearly with eyes that have lost the ability to focus well on their own. Glasses are a quick fix indeed!  However, they don’t address the root cause that allowed your eyes to get out of shape in the first place: deformation of the actual shape of the eye. Myopia (nearsightedness) is caused by elongation of the eye; hyperopia (farsightedness) by the eye becoming shorter in length. And just as one’s leg would never fully recover, but would actually become weaker, if  you continued to use crutches indefinitely, the use of corrective lenses allows your eye to become progressively weaker — either more myopic or hyperopic, as the case may be.  The use of laser surgery may seem to be the best of all fixes, by permanently resculpting the cornea.  But the risks and complications can be significant, and continued bad vision habits can result in the need for repeat surgery. The approach that worked for me — and which I advocate here — is the frequent and strategic use of anti-corrective lenses for several weeks or months, combined with special techniques involving simple eye exercises that will reshape the eye to achieve and maintain visual acuity.  Unlike other eye exercise techniques, such as the Bates Method, the use of anti-corrective lenses has solid experimental support from human and animal studies. By contrast, the Bates Method is based on an unproven idea that refractive errors are caused by “eye strain” and can be relieved by relaxation exercises.

The Bates Method. William Bates believed that the eye changed shaped when attempting to focus, thereby inducing muscular tension. Bates developed a number of techniques, such as “palming” and movement exercises, to help relax the eye, and “visualization” to enhance memory of colors and shapes. But according to Wikipedia:
“Despite continued anecdotal reports of successful results, Bates’ techniques have not been shown to objectively improve eyesight, and his main physiological proposition – that the eyeball changes shape to maintain focus – has consistently been contradicted by observation. In 1952, optometry professor Elwin Marg wrote of Bates, ‘Most of his claims and almost all of his theories have been considered false by practically all visual scientists.’ Marg concluded that the Bates method owed its popularity largely to ‘flashes of clear vision’ experienced by many who followed it. Such occurrences have since been determined to most likely be a contact lens-like effect of moisture on the eye.”
By contrast with the Bates Method, the method of hormetism uses controlled application of stress to induce an adapative growth response — a physical remodelling — of the shape of the eye. Support for this approach comes from extensive animal and human studies showing that the eye actually remodels neuroplastically in response to repeated focusing stimulus.  These experimental results have been synthesized into a theory known as the incremental retinal-defocus theory of myopia development (IRDT theory).  According to the IRDT theory, extensive close-up focusing of the eyes (for example by reading and wearing minus lenses) causes the image of close objects to be out of focus on the retina, resulting in biochemical processes that affect the rate of synthesis of connective tissues that control the rate of growth of retinal tissues and the shape of the eye.  The theoretical and experimental work supporting the IRDT theory is quite interesting and is explained in more detail on the Rehabilitation page of this blog, for those who are interested in the fascinating science behind this.
Anti-corrective lenses. The approach advocated here is a very specific use of anti-corrective lenses in combination with good visual habits to ensure routine variation in the use of the eyes for both up close and distance activities.  The most well documented use of anti-corrective lenses is for the reversal of myopia; in this case it is called “plus lens therapy”. Strange as it may seem, this involves wearing the oppositetype of glasses normally prescribed for myopia or for hyperopia, making it initially less comfortable to focus. Specifically, so-called “plus” lenses are employed to overcome nearsightedness (myopia) and “minus” lenses to overcome farsightedness (hyperopia).   In my discussion on the Rehabilitation page, there is a more extensive discussion of the history of the use of plus lenses. The use of anti-corrective lenses is a classic case of the five general principles of Hormetism, as outlined on the Overview page of this website:
  1. the viewing distance is adjusted to simulate real-world conditions as closely as possible (i.e. the eye is actually focusing in the distance while reading a book or computer screen that is close up);
  2. constraint (an eye cover or plus lens) is imposed on the stronger eye to focus the stress on the weaker eye, and both eyes are held at the limit of their ability to comfortably focus
  3. the intensity is adjusted to be somewhat uncomfortable, but still short of “failure”;
  4. adequate recovery is allowed during rest periods between sessions; and
  5. gradualism is observed by progressively increasing the focal range over time in order to force adaptive remodeling of the eye.
How to proceed. The clearest explanation of how to use plus lenses was given by Brian Severson, who many years ago published the key steps in his “Vision Freedom” system.  Comparing the eye to a digital camera, Severson observed that the eye will attempt to “autofocus” on any image that is slightly out of focus, but will not even attempt to focus on objects that are significantly out of focus. Furthermore, he found that the focal range can be extended by a simple technique.  Here is the essence of the technique:Step 1. Find your starting range of focus:
“Take off your prescription lenses and put this page right on the end of your nose.  Now push the print slowly away until it becomes clear and in focus, and stop.  Now close each eye and see which one is sending the clear image to your brain.  You have just entered the range of focus of your better close vision eye.  It dominates for all close work…Now open both eyes, and slowly push the print away until the very first indication that the print is no longer perfectly clear and in focus, and stop…You have just found the limit of your range of focus for that eye”.

Step 2: Push your eyes to increase their range of focus.
For myopes, this is done by repeatedly pushing a printed page just slightly outside the range of focus, and allowing it to sharpen up or “clear”. (For hyperopes, the page is pulled closer until it blurs, then allowed to clear).  The eye gradually adapts to increase its range. This can be done with different objects at different ranges.  So it can be done with fine print close up, but also with larger objects in the distance.  It is especially useful to focus on sharp lines, such as overhead electrical transmission lines, and houses or trees with sharp edges.
For myopes, the process is best carried out by using plus lenses, the “reading glasses”, available in most pharmacies, that hyperopes typically use for close reading; conversely, hyperopes can accelerate the process by using minus lenses that myopes use for vision distance. Myopes can improve their vision by starting with the strongest plus lenses they can wear that will maintain their reading or computer just within their focal range. (Hyperopes do the converse). Typically, for mild myopia, one starts by wearing a +1 diopter lens and moving up to a +1.5 or +2 lens as soon as it becomes comfortable. If the myopia or hyperopia is extreme to the point where anti-corrective lenses do not allow a reasonable focal range, then it may be preferable or necessary to use reduced prescription lenses, i.e., lenses in which the diopter have been somewhat reduced by +1 or +2 diopters. With time and success, these can be progressively weakened, and a move can be made to anti-corrective lenses.
HERE IS THE CRITICAL STEP: For the focusing exercises, one should periodically push the book or computer slightly out of focal range and wait for the image to clear again. This will cause a slight feeling of discomfort, but the eye will focus as long as the distance is just slightly out of the comfort zone.  If your eyes cannot focus, move a few inches closer again until the reading material is just within focus.
This procedure can be followed for hours or more during everyday activities such as reading and computer work, watching TV, walking or driving. The anti-corrective or reduced prescription lens diopter rating (the plus or minus number) should be selected so as to make the eyes slightly uncomfortable, while still allowing clear focusing. If the right and left eyes are very uneven in strength, it may be necessary to match different corrections to each eye (buy two pairs and pop out and replace one side), or to cover the stronger eye with a patch or diffuser. Much as with CI movement therapy, this follows the principle of “constraint” to ensure that the primary stress is focused on the weaker eye, stimulating it to do most of the focusing, until it catches up with the stronger eye. We don’t want the weak eye to coast along with a “free ride” or only the stronger eye will benefit.
When to use the anti-corrective lenses. It is only necessary to use anti-corrective lenses for short periods of time — one to three hours each day, for the appropriate activities — to see significant progress over several weeks.  It is important to realize that the strong anticorrective lenses are only to be used for the activities for which your prescription glasses were least needed!  So for myopes, wear the plus lenses only for close work (reading and computer work); for hyperopes, wear the minus lenses when looking in the distance or across the room, but not when reading or at the computer. For myope engaging in distance activities (such as driving or viewing presentations), either no lenses or undercorrected lenses are recommended, though very mild plus lenses (less than +1 diopters) can be used when the myopia has been significantly reduced. The key is that the eye will adapt and remodel only when subjected to mildly uncomfortable stress.  If the stress is excessive, the eye gives up and no progress is made.  This principle is very similar that followed by weight lifters, who understand the importance of slight, but not excessive, overload.
Misunderstandings. Failure to understand this need to change or remove anti-corrective lenses in response to the distance of the current activity has led to some flawed studies which purported to show the ineffectiveness of plus lens therapy. One example of this is a frequently cited paper by Chung, Mohidan and O’Leary, which found that myopic children fitted with undercorrected lenses showed a more rapid progression of myopia than children wearing lenses with full correction. So the eyesight of these children actually got worse by using undercorrection than normal correction. This would appear to contradict the IRDT hypothesis that the eye can be stimulated via lens therapy to grow shorter in axial length, and hence reduce myopia. And this result has been repeatedly cited by others as disproving the effectiveness of plus lenses or under correction. However,  a re-analysis of this study by Hung and Ciuffreda of Rutgers University came to a different conclusion. In addition to normal correction and slight undercorrection groups, the Hung and Ciuffreda study included a group using “high-powered plus lenses”. Their analysis found that the high-powered plus lenses led to hyperopic growth (in other words, shortening of the eye’s axial length), which decreased the myopia of the children wearing those lenses. And the progression of myopia in children who wore undercorrected lenses is explained by the fact that they wore these all the time, not when just reading. This led to a diminished stimulus by facilitating accommodative focuses during “near-to-far viewing cycles”, which underminded the benefits of undercorrection. Based upon this analysis, the proper use of undercorrection would be to wear the undercorrective lenses only during long distance viewing. This is a key point!  Note that, according to the protocol of the study (Chung et al, p. 2556), “Subjects were instructed to wear their glasses all the time except during sleeping.” The fact that the undercorrected lenses were worn for close up viewing as well as distance viewing, would tend to undermine their effectiveness, according to the IRDT theory. In their summary, Hung and Ciufredda conclude:
Based on IRDT analysis, high-powered plus lens, full correction, and 0.75 D under-correction result in relative hyperopic, emmetropic, and myopic growth, respectively. Thus, the theory is able to explain these apparently contradictory findings. Moreover, the IRDT provides a consistent theoretical framework for understanding the development of myopia under a variety of experimental and clinical conditions.
So far from disproving the value of plus lenses and undercorrection, this study supports the IRDT theory for treating myopia. The conclusion should be taken as showing how NOT to use undercorrected lenses — don’t wear them for close work and reading, only for far distance viewing activities such as driving.  On the other hand, for close work (reading and computer use), wearing stronger plus lenses are effective in counteracting myopia. Based upon IRDT theory, I suppose the ideal combination would be bifocals with plus lenses for close vision and undercorrection for distance vision, or using two different glasses for these different situations.
Work without lenses. In addition to using anti-corrective lenses for close up activities (or distance activities, in the case of hyperopes), it is important to engage in frequent and deliberate near-to-far focusing exercises in daily life.  Without glasses, take some time to look intently and focus on distant objects, and alternate this with looking at close up objects.  Just as when using the lenses, try to focus on objects at the edge or just beyond of your current focal range, allowing them to “clear”. I found it most helpful to choose objects with crisply defined dark lines or borders, such as telephone poles and power lines or edges of buildings. You’ll soon notice that blurry or “double” images will begin to resolve. I remember becoming excited when I started to see crisp power lines, and billboard signs, and could eventually start to read signs at a distance.  This is one of the most motivating aspects of the technique. On the Rehabilitation page, you’ll find my speculations as to how this resolution of double images relates to the mechanisms of eye remodelling and the IRDT theory.
A final word: Be patient. Your eyes took a long time to lose their shape, and they won’t pop back into shape overnight.  Just as building muscles in the gym takes time and discipline, remodeling your eyes is a step-by-step process that takes time. Most likely, you’ll notice progress in spurts. And just like going to the gym, you will need to keep you eyes in shape by periodically using anti-corrective lenses (especially if you will be spending a lot of time reading or at the computer), and by varying your daily activities to include looking at both near and far objects. But if you stick with it, you’ll find your eyesight is improving, perhaps at a time when many of your older friends are finding their eyesight is getting worse. If this topic interests you, please comment below,  or check out the Rehabilitation Discussion Forum, where a number of people have reported their success with using the Hormetism method for improving eyesight, manual dexterity, and other areas of overcoming the need for corrective devices.



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Tuesday, May 24, 2016

Published 1:26 PM by with 5 comments

तुम्हारी प्यारी सी नज़र अगर इधर नहीं होती


तुम्हारी प्यारी सी नज़र अगर इधर नहीं होती,
नशे में चूर फ़िज़ा इस कदर नहीं होती,
तुम्हारे आने तलक हम को होश रहता है,
फिर उसके बाद हमें कुछ ख़बर नहीं होती.





सपनों की मंज़िल पास नहीं होती,
ज़िंदगी हर पल उदास नहीं होती,
ख़ुदा पे यकीन रखना मेरे दोस्त,
कभी-कभी वो भी मिल जाता है जिसकी आस नही होती.

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Published 12:49 PM by with 0 comment

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Saturday, May 21, 2016

Published 6:52 PM by with 0 comment

1964 में ही परमाणु हथियार विकसित करने की स्थिति में था भारत

अमेरिकी विदेश विभाग की एक खुफिया रिपोर्ट की मानें तो भारत 1964 में ही परमाणु सक्षम बन सकता था, अगर वह ऐसा करना चाहता तो। अमेरिका में गोपनीयता की सूची से हटाई गई विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, अमेरिका के गुप्तचर विभाग ने यह निष्कर्ष निकाला था कि, भारत 1964 में ही परमाणु हथियार विकसित करने की स्थिति में आ गया था। इस क्रम में उसने महाराष्ट्र में ट्रॉम्बे स्थित संयंत्र में ईंधन में तेजी से किए जाने वाले बदलाव का हवाला दिया।



अमेरिकी विदेश मंत्रालय के ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस ऐंड रिसर्च ने 14 मई 1964 की एक रिपोर्ट में कहा, भारतीय अब इस स्थिति में हैं की वे चाहें तो परमाणु हथियारों का विकास शुरू कर सकते हैं। हालांकि हमारे पास शोध और विकास कार्यक्रम का कोई साक्ष्य नहीं है और यदि कार्यक्रम का अस्तित्व है तो हम कुछ साक्ष्य मिलने की उम्मीद करेंगे।
कई अन्य रिपोर्टों के साथ यह रिपोर्ट बुधवार को नैशनल सिक्यॉरिटी आर्काइव और न्यूक्लियर प्रोलिफरेशन इंटरनैशनल हिस्ट्री प्रॉजेक्ट की ओर से प्रकाशित की गई। अमेरिकी गुप्तचर विभाग की रिपोर्ट ने ट्रॉम्बे स्थित कनाडाई-भारतीय संयंत्र के मूल ईंधन में हर छह महीने में बदलाव किए जाने पर भारत के परमाणु उद्देश्यों पर कई प्रश्न उठाए थे।
रिपोर्ट के अनुसार सामान्य अनुसंधान संयंत्र अभियानों के लिए छह महीने का समय काफी कम रहता है। लेकिन यह कनाडाई-भारतीय संयंत्र में खर्च हुए ईंधन का इस्तेमाल करके हथियारों में प्रयोग होने वाले प्लूटोनियम का उत्पादन करने के लिहाज से एकदम उपयुक्त समय है।
जब कनाडाई लोगों ने भारत को संयंत्र उपलब्ध करवाया, तब उन्होंने विशेष सुरक्षा उपाय नहीं किए थे। इस तरह भारतीयों को नवनिर्मित फीनिक्स प्लूटोनियम पृथक्करण संयंत्र का इस्तेमाल विखंडनीय पदार्थ बनाने के लिए करने की आजादी मिल गई।
रिपोर्ट के अनुसार, फीनिक्स संयंत्र लगाने के पीछे भारत के नेतृत्व के राष्ट्रवादी उद्देश्य रहे होंगे लेकिन यदि वह परमाणु हथियारों की क्षमता चाहे तो वह ऐसी क्षमता हासिल करने की कोशिश कर सकता था।
वहीँ INR की रिपोर्ट में कहा गया कि, भारत के हथियार कार्यक्रम से जुड़ा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और उसका मानना है की यह असंभव लगता है कि भारत ने एक बम बनाने का फैसला किया था।
हालाँकि, इसके दस वर्ष 18 मई 1974 को भारत ने पोखरण में पहले और सफल परमाणु परीक्षण का प्रयोग कर विश्व को हैरान कर दिया था। इसके बाद इस कार्यक्रम को 11 और 13 मई 1998 में पोखरण दूसरी बार सफलता पूर्वक किया गया।
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Friday, May 20, 2016

Published 1:22 PM by with 0 comment

इस बॉलीवुड एक्ट्रेस का अश्लील वीडियो पोर्न साइट पर हुआ वायरल, देखिये वो वीडियो यहाँ पर......

पूर्व ब्वॉय फ्रेंड की करतूतों की वजह से बदनामी झेल रहीं बॉलीवुड एक्ट्रेस अलीशा खान टूटी नहीं हैं और न हताश हैं। उनका कहना है कि हमें अपने साथ में होने वाली रेप, छेड़छाड़ और यौन शोषण के लिए दबाव बनाने वाले लोगों के खिलाफ लड़ने की जरूरत है।
 
बॉलीवुड एक्ट्रेस ने कहा कि मेेरे साथ में भी ऐसा हुआ है मेरा वीडियो पोर्न साइट वायरल कर दिया गया है, लेकिन कोई बात नहीं मैं इस तरह से अपनी जान नहीं दूंगी। उन्होंने पुलिस को निशाना बनाते हुए कहा कि पुलिस मेरे मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। इसका मतलब ये नहीं कि मैं भी अपनी जान दे दूं। मैं हार नहीं मानूंगी।
बता दें कि रमते राम रोड स्थित नवाब गाजीउद्दीन की पुरानी कोठी निवासी अलीसा खान फिल्म एक्ट्रेस हैं। 18 मार्च को उन्हें एक्स ब्वॉय फ्रेड ने पर्सनल वीडियो सोशल साइट पर डालने की धमकी दी थी। इसकी एवज में आरोपी ने 50 लाख रुपये की मांग की थी।
इसके बाद आरोपी ने अलीसा के वॉट्सएप पर भी एक धमकी भरा मैसेज भेजा था और एक वीडियो वायरल कर दी थी। इस संबंध में उन्होंने मुंबई साइबर सेल से शिकायत की थी और नगर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। लगातार मीडिया में आ रही खबरों के बाद अलीसा के परिजनों ने उन्हें बुधवार सुबह घर से निकाल दिया था।
इसके बाद से वह दोस्तों के यहां रहकर समय व्यतीत कर रही है। अलीसा ने बताया कि परिजनों ने उसका मोबाइल नंबर व वॉट्सएप भी ब्लॉक कर दिया है। वह अपने पैतृक मकान, संपत्ति व कार के लिए कोर्ट जाकर केस लड़ेगी।
For Video Click On  bit.ly/Vid-Hub-Alisha
 
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Published 11:57 AM by with 0 comment

This Ladies Rooms Trailer Becoming Viral

Here is the trailer of new web series, ‘Ladies Room’, a story of two best friends Khanna & Dingo and 6 Loos. It shows their strange and crazy adventures that happen over six different loos. If the trailer is so crazy, we can’t but start imagining what the real web series would be like.

After the success of It’s A Man’s World and Bang Baaja Baarat, Yash Raj Films is in the light again with another web series called Ladies Room. The YRF trend of web series is striking the chord with the younger generation as more and more people are looking forward to watching these web series.
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Thursday, May 19, 2016

Published 5:21 PM by with 2 comments

इन 5 लोगों की वजह से गुलाम हुआ भारत, नहीं बन सका महाशक्ति

आज हम खुद को आजाद कहते हैं लेकिन जरा दिमाग पर जोर देकर सोचिए, क्या हम वाकई आजाद हैंं. बहरहाल इतिहास के पन्नों को उलटकर देखें तो भारत की गुलामी की एक नई कहानी निकलकर आती है जिसमें देश के दिग्गज शासकों और नवाबों ने अपने निजी स्वार्थों के चलते देश को धोखा दिया था, जिस वजह से देश को दशकों तक गुलामी की जंजीरों में रहना पड़ा और पिछड़ गया.
 

राजा जयचंद
अपनी निजी दुश्मनी के चलते राजा जयचंद ने पृथ्वीराज सिंह चौहान को मारने से भी गुरेज नहीं किया. जयचंद कन्नौज के राजा थे और दिल्ली के शासक पृथ्वीराज सिंह चौहान की बढ़ती प्रसिद्धि से काफी परेशान थे. इसके अलावा उनके पास पृथ्वीराज सिंह चौहान से नफरत करने की एक ओर वजह थी. उनकी बेटी संयोगिता और पृथ्वीराज दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. जयचंद ने  पृथ्वीराज को सबक सिखाने के लिए विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गौरी से हाथ मिला लिया. जिसका नतीजा ये निकला कि तराइन के प्रथम युद्ध 1191 में बुरी तरह हारने के बाद मुहम्मद गौरी ने जयचंद की शह पर दोबारा 1192 में पृथ्वीराज सिंह चौहान को हराने और उन्हें मारने में सफल रहा.
 


राजा मानसिंह
मानसिंह मुगलों के सेना प्रमुख थे. राजा मान सिंह आमेर के कच्छवाहा राजपूत थे. महाराणा प्रताप और मुगलों की सेना के बीच लड़े गए भयावह और खूनी जंग (1576 हल्दी घाटी) में वे मुगल सेना के सेनापति थे. इस युद्ध में महाराणा प्रताप वीरतापूर्वक लड़ते हुए बुरी तरह घायल हो जाने के पश्चात् जंगलों की ओर भाग गए थे और जंगल में ही रहकर और मुगलों से बच-बचकर ही उन्हें पराजित करने और उनका राज्य वापस लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे. लेकिन मानसिंह ने बड़ी चतुराई से उनका खात्मा करवाने में अहम भूमिका अदा की.
 



मीर जाफर
आधुनिक युग में लोग भले ही मीर जाफर को भूल चुके हैं लेकिन मीर जाफर नाम कभी किसी इंसान के लिए गद्दारी का पयार्य हुआ करता था. मीर जाफर बंगाल का पहला नवाब था जिसने बंगाल पर शासन करने के लिए हर तरह के हथकंड़े अपनाए थे. उसके राज को भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की शुरुआत माना जाता है. 1757 के प्लासी युद्ध में सिराज-उद-दौल्ला को हराने के लिए उसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का सहारा लिया था. उसने विदेशी ताकतों को अपनी तरफ मिला लिया था. अपने निजी स्वार्थों के चलते जाफर ने देश को बहुत नुकसान पहुंचाया था.
 



मीर कासिम
मीर कासिम सन् 1760 से 1763 के बीच अंग्रेजों की मदद से बंगाल का नवाब नियुक्त हुआ था. अपने अहंकार की लड़ाई में मीर कासिम ने देश का खासा नुकसान करवाया. इस पूरी लड़ाई में अगर किसी ने कुछ या सबकुछ खोया है तो वह हमारा भारतवर्ष ही है. मीर कासिम ने अंग्रेजों से बगावत करके 1764 में बक्सर का युद्ध लड़ा था, लेकिन ये लड़ाई सकारात्मक सिद्ध नहीं हो सकी और देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ता चला गया.
 



मीर सादिक
आपको याद होगा कि बचपन में हम टीपू सुल्तान को अपना नायक माना करते थे. जिन्होंने विदेशी ताकतों के नाक में दम कर रखा था, लेकिन वो कहते हैं न कि ‘जो कभी किसी से न हारा वो अपनों से हारा.  मीर सादिक टीपू सुल्तान के खास मंत्री थे लेकिन 1799 में टीपू सुल्तान को धोखा देकर अंग्रेजोंं का हाथ थाम लिया. इसके कारण अंग्रेज टीपू सुल्तान के किले पर कब्जा करने और टीपू सुल्तान को मारने में सफल रहे.
 


इन पांच लोगों के चलते देश धीरे-धीरे गुलामी की ओर बढ़ता रहा. अगर उस वक्त इन शासकों ने अपने निजी स्वार्थों को त्याग दिया होता तो देश न सिर्फ गुलामी की जंजीरों में कभी नहीं फंसता बल्कि आज महाशक्ति के रूप में विदेशी ताकतों से कहीं आगे होता




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